. वर्तमान सरकार की हम कितना बचाव कर सकते हैं। जब भी कहीं सरकार किसी मुहिम पर फेल हो जाती है तब अक्सर wattapp University पर कुछ msg को दौड़ते हुए देखा है । उनके example भी कुछ ऐसे होते जिन्हें देखकर उनके सोचने समझने की क्षमता का थोड़ा आकलन हो जाता है। जब नोटबन्दी का मामला चल रहा था और 99.09 प्रतिशत मुद्रा वापस बैंक में आ गया तब भी इनके ज्ञान का भंडार असीमित होता जा रहा था। नोटबन्दी के फायदे बताये जा रहे थे। कि काला धन नष्ट हो जायेगा। किसका नष्ट हुआ? पैसे वालों ने तो comission देकर अपने पैसे सुरक्षित कर लिए, लेकिन जिन्होंने दिन-रात दिहाड़ी मजदूरी करके अपने बेटियों की शादी के लिए कुछ पैसे इकट्ठा करके रखे थे। कितनों की शादियां टूट गयी और कितने माँ-बाप सदमें की हालत से गुजरे। उनकी खबर किसी ने नहीं ली। जब GST को सरकार द्वारा लॉन्च किया गया। उसके बाद मार्केट में अफरातफरी का माहौल बन चुका था। 6 से 7 महीने किसी के पास सही जानकारी नहीं थी। होलसेल तथा किराना की दुकानों में लूट मची थी। GST के नाम पर, पुराने mrp प्रिंट से 20 से 50 रुपये तक अधिक वसूला जा रहा था। फिर मैने Watsapp University पर एक सरपट भागते एक msg जा रहा था तो मैंने पढ़ा जिसमें लिखा था कि हम जब कोई काम शुरू करते हैं शुरू में हम भी फेल हो जाते हैं तो सरकार इतने बड़े आबादी को कैसे सम्भाल सकती है।
एक बात समझ नहीं आया कि उनका प्रयोग जनता पर ही क्यों होता है। तथा उनके समिति में हर प्रकार के प्रत्येक फील्ड के हज़ारों एक्सपर्ट सलाह देने वाले होते हैं। फिर इतनी बड़ी चूक कैसे हो जाती है। यहाँ तक कि वाणिज्य विभाग के सरकारी महकमें को GST के बारे में सही जानकारी मालूम नहीं थी। हम और आप गलती कर सकते हैं, लेकिन सरकार को देश चलाना है और वो देश को अंधे कुएं में कैसे धकेल सकती है। उनके द्वारा background क्यों तैयार नहीं किया गया। क्यों जवाबदेही, पारदर्शिता तय नहीं की गयी।
यहां तक कि GST पोर्टल पर 1.5 सालों तक सही जानकारी मौजूद नहीं थी फिर जनता सही जानकारी किससे मांगती।
मन्दिर और स्मारक बनवाने के लिए हजारों करोड़ रुपये जनता के टैक्स के बर्बाद किये जा सकते हैं। चूंकि यह बहुसंख्यक समाज से सम्बंधित होता है, तो किसी को बोलने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। चूंकि ये धर्म का मामला है तो इसे काफी सेंसिटिस मुद्दा कहा जाने लगता है।
Wattap Msg : मेरे एक मित्र द्वारा प्राप्त
भारत का क्षेत्रफल विश्व का 2% है
विश्व की जनसंख्या 750 करोड़ है
750 करोड़ का 2% होता है 15 करोड़
और भारत की जनसंख्या है 150 करोड़
[125 करोड़ आधार +20% बिना आधार]
शुद्ध हवा और शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है
वायु जल ध्वनि और मृदा प्रदूषण बढ़ रहा है
80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज देने का मतलब भारत में 80 करोड़ गरीब रहते हैं
दलहित से ऊपर उठकर बताइए
यह राष्ट्रीय गर्व की बात है या शर्म की?
यह सरकारों की सफलता है या असफलता?
जनसंख्या विस्फोट रुकना चाहिए या नहीं?
ऊपर दिए गए Msg को दोबारा पढ़ लें कई बातें समझने में आसानी होगी। इस तरह के msg कब अधिक Travel करते हैं इसका भी अनुमान लगाइये। सरकार के नाकामियों को छिपाने का एक नया मुद्दा सामने लाकर पटक दिया जाता है। अब TV खोलकर देखिए debate भी इन्हीं टॉपिक पर होने शुरू हो जाते हैं। और इस तरह से किसी बड़ी वारदात पर धीरे-धीरे पर्दा डाल दिया जाता है।
अब कुछ fact के ऊपर चर्चा करना जरूरी मालूम होता है।
चूंकि देश की आबादी लगभग 150 करोड़ है।
1. कुंभ मेले के लिए उत्तर प्रदेश सरकार 4200 करोड़ रुपये खर्च करती है। तथा 2020 में केवल विज्ञापन करने 160 करोड़ रुपये खर्च कर देती है। ये चर्चा का विषय भी रहा।
2. Statue of Unity 350 करोड़ रुपये की लागत से बनायी जाती है।
3. भारत सरकार वैक्सीन के लिए 35 हज़ार करोड़ रुपये बजट में पास करती है। यानी 150 करोड़ जनसंख्या पर प्रत्येक भारतीय को सुरक्षा किट प्रदान कर वैक्सीन भी लगाया जा सकता है। उसके बाद आरबीआई द्वारा 50 हजार करोड़ रुपये अभी हाल ही में vaccines के लिए पारित किया गया।
4. पुलवामा हमला दिल दहला देने वाला हादसा था अब तक उसकी जांच पूरी नहीं हो पायी।
5. आप थोड़ा तुलना करें 2015 के रक्षा बजट को 2021 के तो कई बातें खुलकर सामने आएंगी। की डर का business कितना मुनाफे वाला होता है।
6. सन 2020 में बढ़ते कोरोना के मामले से जब लोगों में अफरातफरी का माहौल बरपा हो गया था। पुलिसकर्मियों के पास सही जानकारी का ना होना। लोगों को जानवरों की तरह सड़क पर बेरहमी से पीटते हुए दिखायी दिये। अब इन्हें कौन सही जानकारी प्रदान करता, किसकी जिम्मेदारी थी इस पर सवाल करने से देश के राष्ट्रीय गर्व का अपमान होता है ऐसा कुछ लोगों को महसूस हुआ। अभी हाल ही में कई रैलियां निकली जिनमें करोड़ों की संख्या में जमावड़े लगे तब शायद कोरोना को सरकारी नींद की गोली दे दी गयी थी। उनके रैलियों में जाने के लिये यही पुलिसकर्मी रास्ता देते नजर आये, लेकिन जिन्होंने ने घर के राशन के लिए बाहर कदम रखा तो उनके पैर, हाथ तोड़ दिए गए। तब सरकारी हिमायत करने वाले सो रहे थे।
6. जब सरकारी नौकरी की चर्चा होती है तब भी कुछ बुद्धिजीवी अजीब तरह के सवाल पैदा कर देते हैं कि इतनी बड़ी जनसंख्या को नौकरी देना आसान थोड़े ही है। फिर सवाल यही पैदा होता है कि नौकरियों के नोटिफिकेशन निकलते ही उनके एग्जाम, रिजल्ट की परवाह क्यों नहीं कि जाती है। एक एग्जाम को कराने में 4 से 5 साल लग जाते हैं। RO/ARO एग्जाम 2015 में धांधली हुई और उसका एग्जाम 2020 में कराया गया। किसी भी तैयारी कर रहे स्टूडेंट्स के साथ ये खिलवाड़ सरकार खेल सकती है। उनकी उम्र निकल जाती इस इंतजार में कि अब क्लियर हो जायेगा, लेकिन हमेशा की तरह उनके हाथ में घण्टा थमा दिया जाता है।
7. Private नौकरी के लायक स्कूलों में पढ़ाई तो होती नहीं, फिर किस उम्मीद पर बच्चें पढ़ाई करते जाये। अब सबके नसीब में कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने का अवसर थोड़े ही मिलता है।
नोट: यह लेख किसी के भावनाओं को आहत करने के लिए नहीं लिखा गया, यदि किसी की भावना आहत होती है तो इसका जिम्मेदार लेखक नहीं होगा।
@SabeelAhmad
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