मदरसे के बच्चे और मौलवी साहब

मदरसे के बच्चे और मौलवी साहब

जिस गांव के लोग दौर-ए-जहलत में हो, रमजान का महीना आते ही बड़े पुर खुलश से तैयारी करना और तरावीह पढ़ना, कुरान तरवीर खत्म होने के बाद आधा सफ़ का खाली हो जाना, भोर के वक्त उठकर मस्जिद में मोबाइल से नात प्ले करना, नात पढ़ना और वक्त ब वक्त सहरी के टाइम के हवाले से एलान करते रहना। ईद आते ही अच्छे और बेहतरीन कपड़े बनवाना, सिनेमा थिएटर में मूवी देखने के लिए जाना।

किसी गांव में कोई इंतकाल कर जाए, इसके दूसरे दिन कुरआन ख्वानी का एहतमाम करना, अपने गांव में कुरान पढ़ने वालों की कमी होने की वजह से किसी दूर गांव के मदरसे से बच्चों और मौलवी साहब को बुलाना। लोगों का कुरान पढ़ना बाज इसे कई बच्चे होते है जिन्हें ठीक से कुरान पढ़ना नहीं आता है, मौलवी से के साथ उनका आना जिस घर की जैसी हैसियत होती है वो बच्चों के लिए चाय, बिस्कुट, बिरयानी, मटर पनीर और पुड़ी, गुलाबजामुन या कोई मीठा खिलाता है इसके पश्चात 100-500 रुपए हर बच्चे को देना और मौलवी साहब को 500-1000 रुपए देना।
और साथ ही साथ बिरयानी बनवाकर पूरे खानदान को खिलाना और बंटवाना।
मौलवी साहब का 40 दिन तक घर पर आना और कुछ पढ़कर फातेहा करना, दिन पूरे हो जाने के बाद 5000-10000 रुपए का देना।

इंसान अगर कभी गलती या गुनाह, चोरी, झूठ बोले और इसकी पकड़ न हो तो वह एक बार के बाद दोबारा कटा है इसपर कोई सजा या पकड़ न हो तो वह एक बार फिर से करना उसे ठीक लगता है, और इसके पश्चात उसके जिंदगी का हिस्सा बन जाना ये आम बात हो जाती है।
लोगों को बहुत से मुगालते है कि हमारा रब सब माफ कर देने वाला है 'बेशक'  ये सही बात है पर हम कितना जानते हैं

गुनाह सगीरा रब तौबा Astagfaar करने, subhanallah, रब की तस्वीह करने पर माफ कर देता है
2. गुनाह-ए-सगीरा (छोटे गुनाह)
ये छोटे गुनाह हैं, जो बार-बार करने से बड़े बन सकते हैं।
🔹 उदाहरण:
झूठ बोलना (हल्का झूठ)
गाली देना
बुरी नजर से देखना
दिल में बुरा ख्याल लाना
वक्त की बर्बादी
चुगली (ग़ीबत)
छोटी चोरी
नमाज़ में लापरवाही
वादा तोड़ना
📖 कुरान रेफरेंस:
सूरह निसा 4:31
“अगर तुम बड़े गुनाहों से बचोगे, तो हम तुम्हारे छोटे गुनाह माफ कर देंगे…”
📖 हदीस:
Sahih al-Bukhari
“छोटे गुनाह इकट्ठा होकर इंसान को तबाह कर देते हैं…”

2. गुनाह-ए-कबीरा (बड़े गुनाह)
ये वो गुनाह हैं जिन पर सख्त सज़ा, लानत या जहन्नम की चेतावनी आई है।
🔥 मुख्य गुनाह-ए-कबीरा की लिस्ट:
1. शिर्क (अल्लाह के साथ किसी को शरीक करना)
📖 कुरान: सूरह निसा 4:48
“अल्लाह शिर्क को माफ नहीं करता…”

2. क़त्ल (नाहक़ किसी को मारना)
📖 कुरान: सूरह माइदा 5:32

3. जादू / टोना (सिहर)
📖 कुरान: सूरह बकरा 2:102

4. नमाज़ छोड़ना
📖 हदीस:
“हमारे और उनके बीच फर्क नमाज़ है…” (तिर्मिज़ी)

5. ज़िना (व्यभिचार)
📖 कुरान: सूरह इसरा 17:32

6. सूद (ब्याज लेना-देना)
📖 कुरान: सूरह बकरा 2:275

7. झूठी गवाही देना
📖 हदीस: (बुखारी, मुस्लिम)

8. यतीम का माल खाना
📖 कुरान: सूरह निसा 4:10

9. जंग से भागना
📖 कुरान: सूरह अनफाल 8:15

10. माता-पिता की नाफरमानी
📖 हदीस: (बुखारी)

11. पाक दामन औरत पर इल्ज़ाम लगाना
📖 कुरान: सूरह नूर 24:4

12. चोरी
📖 कुरान: सूरह माइदा 5:38

13. शराब पीना
📖 कुरान: सूरह माइदा 5:90

14. खुदकुशी करना
📖 कुरान: सूरह निसा 4:29

📌 हदीस में 7 बड़े गुनाह (सहीह बुखारी):
“सात हलाक करने वाले गुनाहों से बचो…”
शिर्क
जादू
नाहक कत्ल
सूद खाना
यतीम का माल खाना
जंग से भागना
पाक दामन औरत पर इल्ज़ाम

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जरूरी बात
हर गुनाह से तौबा जरूरी है, चाहे छोटा हो या बड़ा
अल्लाह बहुत रहम करने वाला है
📖 सूरह जुमर 39:53
“ऐ मेरे बंदों, जो अपने ऊपर जुल्म कर बैठे हो, अल्लाह की रहमत से मायूस न हो…”
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चूंकि मौलवी साहब को भी अपना घर चलाना है।उनके घर के अखरजत है उनके बीबी का टशन, बच्चों की जरूरतें अजीब कशमकश में डाल दिया करती हैं। दिल पर जब जंग आ जाए और जब तक वो धूल न जाए तब तक हलाल व हराम, सही वो गलत में फर्क करना उनके लिए और आम लोगों के लिए भी थोड़ी मुश्किल हो जाती है।

इस तरह का रश्म आम हो जाना किसी कौम को कितना पीछे की ओर धकेल देती है। इसका फायदा उस कौम के ठेकेदार संभालने लगते है। क्योंकि उनको भी अपना घर चलाना है। गांव या घर के लोग जाहिल होंगे तो दीन में नए नए रश्म व रिवाज लोग डालते रहेंगे, उनके दादा या उनके गांव में किसी ने कुछ काम किया, लोगों को पसंद आया और वो धीरे-धीरे दीन का कब हिस्सा बन गया और उनकी आने वाली नस्लें उसी राह पर चल पड़ी। इसका असर दीन असल दीवार को ज्यादा चोट पहुंचाती है।

डॉ इसरार साहब किसी मजमे बैठे थे एक खातून से सवाल किया तो इसके जवाब में डाक्टर साहब ने कहा कि इस्लाम में कोई मौलवी प्रोफेशन नहीं, हर शख्स को इस काबिल होना चाहिए कि वो अरबी सीखे नमाज खुद पढ़ा सके, अपने घरवालों के जनाजे की नमाज पढ़ा सके, अपने बच्चों की निकाह खुद पढ़ा सके, क्योंकि जो दुआ उसके दिल निकलेगी वो किसी और के दिल से नहीं निकल सकती है।
हमने अपने जिंदगी में बीए, एमए, एमबीए,मेडिकल साइंस, बीटेक किया तो हम पर लाज़िम हैं कि हम अरबी सीखे, मतलब समझे।
इसकी शुरुआत मदरसे हो हो सकती है पर कुछ शरायत को फॉलो करना पड़ेगी।


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